क्या ही हो जाएगा ?
और क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
मेरा ट्रेन के गंदे टॉयलेट को अनदेखा न करने में,
और सही से साफ़ करके आने में,
चाहे मुझे कितना भी ख़राब क्यों ना मिला हो ।
.
क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
लाइन में तरीक़े से खड़े रहने में,
और जो काटें उन पर ना चिल्लाने में,
चाहे कितना ही पीछे क्यों ना हो जाऊँ, इस ज़माने में ।
.
क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
सड़क पे कूड़ा ना फैलाने में,
और जो हो अपना कचरा, उसे जेब में रख घर ले आने में,
चाहे पूरी सड़क ही भरी क्यों ना हो गंदगी के हर पैमाने में ।
.
क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
लाल बत्ती पे रुक जाने में, फालतू हॉर्न ना बजाने में,
सीट बेल्ट लगाने में और संभल कर गाड़ी चलाने में
चाहे दुनिया लगी हो उन्ही नियमों की धज्जियाँ उड़ाने में ।
.
क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
पब्लिक प्लेस में स्पीकर पे न्यूज़ और रील्स ना चलाने में,
या चिल्ला-चिल्ला के आपस में या फ़ोन पे ना बतियाने में,
चाहे लोग लगें हो इसी को सामाजिक ताना-बाना बताने में ।
.
क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
अपना काम पूरी ईमानदारी से कर जाने में,
रिश्वत ना खिलाने में और घटिया जुगाड़ ना लगाने में,
चाहे लोग इस्तेमाल करें उसका, तुमसे आगे बढ़ जाने में ।
.
क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
किसी को छोटा ना दिखाने में,
सबको अपने बराबर और अपने जैसा मानने में,
चाहे कुछ लोग नकार दे तुम्हें अपने साथ बिठाने में ।
.
क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
ज़िन्दगी के सवालों में फँसे हुए को उठाने में,
भूखे को खिलाने में, मेहनती को टिप देकर आने में,
चाहे जितनी भी मेहनत लगी हो तुम्हें वो पैसा कमाने में ।
.
क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
दुनिया के लिये नक़ली तस्वीरे ना लगाने में,
मतलब के लिए दोस्त और ज़रूरत के लिए रिश्ते ना बनाने में,
चाहे कितने ही अकेले क्यों ना लगो, तुम इस भीड़ भरे ज़माने में ।
.
क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
ख़ुद को जानने और कुछ उसूलों को मानने में,
ख़ुद की कहानी ख़ुद से ही लिखने और सुनाने में,
चाहे दुनिया लगी हो, तुम्हें अपने हिसाब से कुछ और ही बनाने में ।

तो जी हाँ, “फ़र्क़ तो पड़ता है”,
इस हिंदी कविता में उर्दू घुसाने में,
और आपको बताने में,
कि आख़िर “क्या ही हो जाएगा” ।
.
परिवर्तन आता है; जब तुम आसान नहीं लेकिन सही करते हो,
फिर चाहे कितना ही मुश्किल क्यों ना हो, हर बार सही कर जाने में ।
.
एक समाज में;
जिसे बदलने में पीढ़ियाँ लगती हैं।
और दूसरा तुम्हारे भीतर;
जो दिखता है, मन की शांति और हौसले में।
.
फिर बाहर कितनी ही उथल-पुथल या बर्फीले तूफ़ान क्यों न हो,
तुम्हारे भीतर हमेशा शांत सा बैठा रहता है; एक स्थिर व्यक्तित्व ।
.
जो झलकता है तुम्हारे चेहरे पर, एक मंद लेकिन सुकून भरी मुस्कान में ।
और वही देता है तुम्हें हिम्मत लड़ने की, इस ज़िंदगी में आने वाले इम्तिहानों से ।