जब जीवन के संघर्षों से अनभिज्ञ थे,
कुछ भी कर सकते हो, वैसे निर्भय थे।
नहीं सोचा करते थे, सुबह समय से उठना है,
कोई था नहीं बताने वाला, अब तो रुकना है।
कहाँ थीं जीवन में उलझनें ऐसी,
कि समय कहे, अब तो झुकना है।
और नहीं दबाए गए थे इतने,
कि परिस्थितियाँ कहें, सही होकर भी सुनना है।
ज़िम्मेदार कहलाते हैं आजकल
अपने सपनों को मारने वाले,
व्यस्त दिखाते हैं स्वयं को,
समाज के तानों को जाँचने वाले।
यही सब रोक रहा है क्या तुम्हें
स्वयं को भीतर से जानने में।
निराश हो जब से भूले हो तुम,
स्वयं के सामर्थ्य को पहचानने में।
समर्पित हो अपने कर्तव्य को,
तो जीवन के संघर्षों से अनभिज्ञ हो।
मुस्कुराते रहो अपनी आँखों से,
तो प्रलय में भी निर्भय हो।
स्वाध्याय है, अगर मूल तुम्हारा,
तो स्वयं में तुम निरंतर उतरते चलो।
अघोर है, यह जीवन तुम्हारा,
तो सत्य के पथ पर स्वतंत्र तुम चलो।
